रोहन की आंखें खुलीं। रातभर वह पल उसके दिमाग में घूमता रहा था। मीरा की बगल, नरम त्वचा, हल्के बाल और पसीने की चमक। कुछ अजीब सा अहसास अभी भी बाकी था। वह उठकर नहाया और बाहर आया।
मीरा रसोई में चाय बना रही थीं। उनकी पीठ उसकी तरफ थी। ब्लाउज की पतली आस्तीन थी। रोहन ने स्वाभाविक रूप से ही नजर दौड़ाई, लेकिन इस बार कुछ खास नहीं दिखा। मीरा ने मुड़कर देखा और मुस्कुराईं।
“चाय पी लो। रात को देर से सोए थे क्या?”
रोहन ने सिर हिलाया। “हां मौसी, नींद देर से आई।”
दोनों चाय पीने बैठे। बातचीत सामान्य रही। मौसम, बाजार, राजेश अंकल के लौटने का समय। लेकिन रोहन का ध्यान बार-बार मीरा की बाहों पर चला जाता। वह खुद को रोक रहा था। कुछ कहने का मन नहीं कर रहा था।
दोपहर का समय फिर आया। गर्मी और बढ़ गई थी। मीरा घर के काम में व्यस्त थीं। रोहन अपने कमरे में किताब लेकर बैठा था, लेकिन पढ़ नहीं पा रहा था। मन बार-बार उसी पल पर चला जा रहा था। पहली बार देखी गई वह बगल। अनजानी सी उत्सुकता।
शाम को मीरा ने कहा, “चलो, थोड़ी हवा खाने बालकनी में बैठते हैं।”
दोनों बालकनी में कुर्सियों पर बैठ गए। हल्की हवा चल रही थी। मीरा ने अपने बाल खोले और पीछे बांधने लगीं। हाथ ऊपर उठे। ब्लाउज की आस्तीन थोड़ी खिसकी। एक पल के लिए फिर वही दृश्य सामने आ गया। रोहन की नजर रुक गई। दिल की धड़कन तेज हो गई। इस बार मीरा ने भी उसकी नजर पकड़ ली।
कुछ पल खामोशी रही। मीरा ने धीरे से आस्तीन ठीक की और मुस्कुराईं, लेकिन मुस्कान में पहले जैसी सहजता नहीं थी। दोनों की नजरें मिलीं और फिर हट गईं।
रात का खाना चुपचाप हुआ। बातें कम हुईं। रोहन अपने कमरे में आया तो मन और बेचैन था। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह अहसास क्या है। सिर्फ एक नजर, सिर्फ एक पल, और अब हर वक्त वही याद आ रहा था। घर की शांति में कुछ बदलता जा रहा था। अभी कोई शब्द नहीं बोला गया था। लेकिन हवा में एक अनकही सी हलचल तैर रही थी।