भारतीय वाङ्मय में ब्रह्मांड की उत्पत्ति कोई भौतिक घटना मात्र नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार है। यह महाकाव्य उस 'अनादि गीत' को स्वर देता है जो ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (१०.१२९) के रहस्यों से शुरू होकर मानवता के कल्याण तक प्रवाहित होता है।
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥
अर्थात : तब न असत् था, न सत्। न अंतरिक्ष था और न ही उससे परे आकाश। वह आवरण करने वाला तत्व कहाँ था ? किसके संरक्षण में था ? क्या वहाँ गहन और गंभीर जल था ?
काव्य का प्रारंभ उस महाशून्य से होता है जहाँ 'सत्' और 'असत्' का भेद भी मिट चुका था। उस अंधकारमय अवस्था में जब परब्रह्म के मन में 'काम' (सृजन की इच्छा) का प्रथम बीज अंकुरित हुआ, तब ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ । सृजन की इस प्रक्रिया में ब्रह्मा ने अपने नेत्रों से महर्षि अत्रि को जन्म दिया । 'अत्रि' का अर्थ ब्रह्मांड पुराण में सुंदर रूप में उल्लेखित है:
अहं तृतीय इत्यत्रिस्तस्मादत्रिः स कीर्त्यते॥
अर्थात वह जो तीन गुणों (सत्व-रजस-तमस) के संतुलन का आधार है । वे केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि ऋग्वेद के पंचम मंडल के मंत्र-द्रष्टा हैं, जिन्होंने असुर स्वरभानु द्वारा ग्रसित सूर्य को अपनी 'चतुर्थ प्रार्थना' से मुक्त कराया था ।
यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः।
अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः॥
अर्थात : हे सूर्य! जब असुर स्वरभानु ने तुम्हें अंधकार से बेध दिया, तब चराचर प्राणी मार्ग भूलकर दिशाभ्रमित हो गए थे।
अत्रि की तपस्या का पूरक माता अनुसूया का 'शील' बना। प्रजापति कर्दम और देवहूति की यह पुत्री ईर्ष्या और द्वेष से पूर्णतः मुक्त थी । वाल्मीकि रामायण साक्ष्य देती है कि अनुसूया के तप में वह सामर्थ्य था कि उन्होंने दस वर्ष के भीषण अकाल को समाप्त कर मंदाकिनी को पृथ्वी पर उतार दिया :
अनसूया महाभागा तापसी धर्मचारिणी।
मंदाकिन्याः समुत्पत्तिः तपोबलविदर्शिता॥
अनुसूया की पवित्रता की परीक्षा लेने आए त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) उनके वात्सल्य के वशीभूत होकर शिशु बन गए । इसी वरदान से तीन दिव्य पुत्रों का जन्म हुआ—दत्तात्रेय (विष्णु अंश), दुर्वासा (शिव अंश) और चंद्रमा (ब्रह्मा अंश) । यह महाकाव्य चित्रकूट की 'तपोभूमि' से बढ़कर आजमगढ़ की उस 'कर्मभूमि' को रेखांकित करता है जहाँ इन पुत्रों ने अपनी साधना पूर्ण की :
1. दत्तात्रेय आश्रम: जहाँ तमसा और कुँवर के तट पर योग और प्रकृति संरक्षण का पाठ पढ़ाया गया ।
पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रवि:।
2. दुर्वासा धाम: जहाँ तमसा और मंजूषा का संगम पापी के कलुष को धोता है ।
3. चंद्रमा ऋषि आश्रम: जहाँ तमसा और सिलनी के मिलाप पर चंद्रमा ने क्षय रोग से मुक्ति पाकर 'सोमनाथ' की महिमा को सिद्ध किया ।
लीला के अंत में, महर्षि अत्रि आकाश में 'सप्तर्षि मंडल' (Ursa Major) के चौथे नक्षत्र के रूप में स्थापित हुए । वे आज भी ध्रुव तारे की रक्षा करते हुए मानवता को 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) का बोध करा रहे हैं।
यह ग्रंथ शून्य से शुरू होकर अनंत तक जाने वाली उस ऋषि-परंपरा का एक डिजिटल अर्पण है, जो पाठकों को आत्म-साक्षात्कार और लोक-कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।